“ एक लेख़क का यह कर्तव्य होना चाहिए कि वह अपनी लेखनी से जो भी बात लिखे वह सदैव सार्वभौमिकताओं को सिद्ध करे | ” अपने लेखन कार्य से इस बात को सिद्ध करने वाले तथा राम कथा लेखन व साहित्य में अत्यन्त झुकाव रखने वाले ख्यातिप्राप्त लेख़क, कवि और बहुत ही प्रतिभाशील निबंधकार सुदामा लाल पाल का जन्म 15/08/1939 (राजकीय सेवा के अनुसार) को उ.प्र. के जनपद इटावा में एक गाँव “नगला सरैया कुइंता व तहसील ताखा “ के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था | जन्मपत्री के अनुसार इनका जन्म पौष कृष्ण पक्ष त्रयोदशी सम्वत् 1993 विक्रम तदानुसार दिसंबर 1936 ई. को हुआ था | इनके पिता का नाम सरदार सिंह व माता का नाम लडैती देवी था | इनके पिताजी गाँव व उसके आस पास के क्षेत्र के अत्यन्त सम्मानित व प्रतिष्ठित व्यक्ति थे |
प्रारंभिक शिक्षा गाँव में तथा उसके बाद शहर में आकर मेट्रिक की
परीक्षा उतीर्ण की | उसके बाद आनंदकर कार्यालय लि. इटावा की दवाइयों के प्रचारक के
रूप में 5 मई 1956 ई. से अक्टूबर उन्नीस सौ छप्पन (31/10/1956 ई.) तक कार्यरत रहे | तद्पश्चात नवम्बर 1956 ई.
में चकबंदी विभाग में लेखपाल के पद पर कार्यरत हुए तथा कुछ समय बाद ही चकबंदी कर्ता
– कानून गो के पद पर 1966 ई. तक अपनी सेवाएँ दी (1956 – 1966)
1966 ई. में चकबंदी विभाग से इस्तीफ़ा देकर जनवरी 1968 ई. में अध्यापक
के पद पर नियुक्त हो गए | अध्यापक पद पर सेवारत रहने के दौरान इनका अध्यापन
व अध्धयन दोनों ही कार्य एक साथ चलते रहे और इन्होने सेवारत रहते हुए ही कला –
निष्णात (एम. ए.) की उपाधि तीन विषयों हिंदी, संस्कृत व समाजशास्त्र से प्राप्त की
| 30 जून 2000 ई. को अध्यापक के पद से अवकाश प्राप्त किया |
वर्तमान समय में श्री सुदामा लाल पाल अपने लेखन व अध्ययन कार्य को सुचारू
रूप से करते हैं | इनकी अभी तक 15 पुस्तकें लिखित हैं जिनमें से 9 पुस्तकें अभी
प्रकाशित हो चुकी हैं तथा 3 पुस्तकें प्रकाशाधीन और 3 पुस्तकें अप्रकाशित हैं |
अपनी सभी पुस्तकों के आभार प्रष्ठ में वह अपने सभी परिवारीजनो का सह्रदय धन्यवाद देते हैं जो कुछ इस प्रकार है – “मैं अपने परिवार के सभी सदस्यों का ह्रदय से
धन्यवाद करता हूं जिन्होंने मुझे घरेलू शांति , सुरक्षा और सेवा देकर कुछ लिखने के
लिये पर्याप्त अवसर दिया है जो एक लेख़क के लिए परम आवश्यक है |”
श्री सुदामा लाल पाल की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक “ षटरिपु निबंधमाला “ है जिसमे मानव के 8 मनोभावों को विषय केंद्र बनाकर उनको निबंधमाला का रूप प्रदान किया गया हैं | इस पुस्तक के बारे में उनसे बातचीत के एक अंश में जब उनसे पूछा गया की वे अपने लेखन साहित्य का मूल्यांकन किस प्रकार करते हैं तो उनका उत्तर कुछ इस प्रकार होता है – “ निबंध गद्य का परम आवश्यक अंग है | अब निबंधों का साहित्य संसार अति दीर्घ्य और विस्तृत हो गया है | किंतु मैंने कुछ निबंधकारों और उनकी कृतियों के संबंध में अध्ययन किया | उन रचनाओं की ज्ञान लहरियों को कितना संजोया – संभाला इस बारे में कुछ कह नहीं सकता |
मैं अपनी ज्ञान क्षमता के विषय में यह लिखना आवश्यक समझता हूं कि “ शायद मैं अच्छे विषयों पर अच्छी निबंध शैली के आधार पर निबंध लिखने योग्य नहीं हूं | “ फिर भी मुझमे एक दुर्गुण है कि किसी व्यक्ति को कुछ अच्छा करते देखकर उसका अनुकरण करने की जिज्ञासा अवश्य उत्त्पन्न होती है इसी निष्ठा हठ और विश्वास के कारण एक षटरिपु निबंधमाला लिखने का निर्णय लिया जिसमे निम्नलिखित विषयों को निबंध का प्रकरण बनाया – (1) काम वासना (2) क्रोध (3) लोभ (4) मोह (5) विशुद्ध प्रेम (6) मद (7) मत्सर (8) सुख – दुःख | “
और अपने बारे में कुछ कहने के लिए वे इस वाक्य को सर्वप्रथम वरीयता
देते हैं – “बालक बचनु करिअ नहीं काना”
इनकी लेखन शैली और शब्द चयन के एक बेहतर ढंग के कारण साहित्य जगत में
इनकी रचनाओं का भरपूर स्वागत होता है |”
वर्तमान पता - सुदामा कुटी पश्चिमी अशोक नगर, फर्रुखाबाद रोड के पश्चिम ओर ,जनता इंटर कॉलेज के उत्तर में, गली न. 7, म. न. 224, शहर इटावा, उ. प्र., 206001
संपर्क सूत्र - 8273859006, 9719458006, 8791632520
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